माँ: वो आँचल जिसने सब समेट लिया
माँ पर एक भावुक कविता सोचता हूँ, तुम्हारी ज़िंदगी का वो कौन सा हिस्सा था जो सिर्फ़ तुम्हारा था? वो कौन सी ख्वाहिश थी जो तुमने अपने लिए माँगी थी? वो कौन सी नींद थी जो बिना किसी फ़िक्र के पूरी हुई?
शायद कोई नहीं।
तुम्हारा वजूद, तुम्हारी साँसें, तुम्हारी दुनिया, सब हम बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती रहीं।
तुम्हें याद है माँ? जब मैं रात में जाग जाता था, तुम अपनी नींद तोड़कर मुझे गोद में उठा लेती थीं। मेरी ज़रा सी आहट पर तुम्हारा दिल काँप जाता था। आज मैं रातों को जागता हूँ, पर तुम अब पूछने नहीं आतीं, “सब ठीक तो है?”
तुम्हें याद है माँ? वो फटा हुआ आँचल तुम्हारा, जिससे तुम मेरा मुँह पोंछती थीं, मेरी आँख के आँसू, मेरे माथे का पसीना, और कभी-कभी मेरी ज़िद की धूल भी। उस आँचल में जाने कौन सा जादू था, सर पर रखते ही दुनिया की सारी बलाएँ टल जाती थीं।
तुम्हें याद है माँ? वो एक रोटी जो तुम कम खाती थीं, ताकि मेरी थाली कभी खाली न रहे। “मुझे भूख नहीं है,” ये झूठ तुमने कितनी आसानी से बोला था, और मैं नासमझ, हर बार सच मान लेता था।
तुम्हारी हथेलियों की लकीरें हमारी किस्मत लिखते-लिखते घिस गईं, तुम्हारी आँखों की चमक हमारे ख्वाबों को रौशन करते-करते धुंधली हो गई। तुम्हारे पैरों की बिवाइयाँ घर आँगन में दौड़ते-दौड़ते फट गईं।
हमने तुमसे सब कुछ ले लिया, तुम्हारा वक़्त, तुम्हारी जवानी, तुम्हारी नींद। और बदले में. बस कुछ शिकायतें दीं, कि तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?
आज जब दुनिया की भीड़ में अकेला खड़ा होता हूँ, जब हर रिश्ता मतलब से तौला जाता है, तब तुम्हारी बे-मतलब की मोहब्बत बहुत याद आती है, माँ।
काश, मैं लौट पाता उस बचपन में, और तुम्हारी गोद में सर रखकर कह पाता, “माँ, मुझे भूख नहीं है, आज वो एक रोटी तुम खा लो।”
